1वे आकाश तक चढ़ जाते, फिर गहराई में उतर आते हैं; और क्लेश के मारे उनके जी में जी नहीं रहता;
2वे चक्कर खाते, और मत वाले की नाईं लड़खड़ाते हैं, और उनकी सारी बुद्धि मारी जाती है।
3तब वे संकट में यहोवा की दोहाई देते हैं, और वह उन को सकेती से निकालता है।
4वह आंधी को थाम देता है और तरंगें बैठ जाती हैं।
5तब वे उनके बैठने से आनन्दित होते हैं, और वह उन को मन चाहे बन्दर स्थान में पहुंचा देता है।

6लोग यहोवा की करूणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें।
7और सभा में उसको सराहें, और पुरनियों के बैठक में उसकी स्तुति करें॥
8वह नदियों को जंगल बना डालता है, और जल के सोतों को सूखी भूमि कर देता है।
9वह फलवन्त भूमि को नोनी करता है, यह वहां के रहने वालों की दुष्टता के कारण होता है।
10वह जंगल को जल का ताल, और निर्जल देश को जल के सोते कर देता है।

11और वहां वह भूखों को बसाता है, कि वे बसने के लिये नगर तैयार करें;
12और खेती करें, और दाख की बारियां लगाएं, और भांति भांति के फल उपजा लें।
13और वह उन को ऐसी आशीष देता है कि वे बहुत बढ़ जाते हैं, और उनके पशुओं को भी वह घटने नहीं देता॥
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