1यहोवा शत्रु बन गया, उसने इस्राएल को निगल लिया; उसके सारे भवनों को उसने मिटा दिया, और उसके दृढ़ गढ़ों को नष्ट कर डाला है; और यहूदा की पुत्री का रोना-पीटना बहुत बढ़ाया है।
2उसने अपना मण्डप बारी के मचान की नाईं अचानक गिरा दिया, अपने मिलापस्थान को उसने नाश किया है; यहोवा ने सिय्योन में नियत पर्व और विश्रामदिन दोनों को भुला दिया है, और अपने भड़के हुए कोप से राजा और याजक दोनों का तिरस्कार किया है।
3यहोवा ने अपनी वेदी मन से उतार दी, और अपना पवित्रस्थान अपमान के साथ तज दिया है; उसके भवनों की भीतों को उसने शत्रुओं के वश में कर दिया; यहोवा के भवन में उन्होंने ऐसा कोलाहल मचाया कि मानो नियत वर्ष का दिन हो।
4यहोवा ने सिय्योन की कुमारी की शहरपनाह तोड़ डालने को ठाना था: उसने डोरी डाली और अपना हाथ उसे नाश करने से नहीं खींचा; उसने किले और शहरपनाह दोनों से विलाप करवाया, वे दोनों एक साथ गिराए गए हैं।
5उसके फाटक भूमि में धंस गए हैं, उनके बेड़ों को उसने तोड़ कर नाश किया। उसके राजा और हाकिम अन्यजातियों में रहने के कारण व्यवस्थारहित हो गए हैं, और उसके भविष्यद्वक्ता यहोवा से दर्शन नहीं पाते हैं।

6सिय्योन की पुत्री के पुरनिये भूमि पर चुपचाप बैठे हैं; उन्होंने अपने सिर पर धूल उड़ाई और टाट का फेंटा बान्धा है; यरूशलेम की कुमारियों ने अपना अपना सिर भूमि तक झुकाया है।
7मेरी आंखें आंसू बहाते बहाते रह गई हैं; मेरी अन्तडिय़ां ऐंठी जाती हैं; मेरे लोगों की पुत्री के विनाश के कारण मेरा कलेजा फट गया है, क्योंकि बच्चे वरन दूधपिउवे बच्चे भी नगर के चौकों में मूर्च्छित होते हैं।
8वे अपनी अपनी माता से रोकर कहते हैं, अन्न और दाखमधु कहां हैं? वे नगर के चौकों में घायल किए हुए मनुष्य की नाईं मूर्च्छित हो कर अपने प्राण अपनी अपनी माता की गोद में छोड़ते हैं।
9हे यरूशलेम की पुत्री, मैं तुझ से क्या कहूं? मैं तेरी उपमा किस से दूं? हे सिय्योन की कुमारी कन्या, मैं कौन सी वस्तु तेरे समान ठहरा कर तुझे शान्ति दूं? क्योंकि तेरा दु:ख समुद्र सा अपार है; तुझे कौन चंगा कर सकता है?
10तेरे भविष्यद्वक्ताओं ने दर्शन का दावा कर के तुझ से व्यर्थ और मूर्खता की बातें कही हैं; उन्होंने तेरा अधर्म प्रगट नहीं किया, नहीं तो तेरी बंधुआई न होने पाती; परन्तु उन्होंने तुझे व्यर्थ के और झूठे वचन बताए। जो तेरे लिये देश से निकाल दिए जाने का कारण हुए।

11सब बटोही तुझ पर ताली बजाते हैं; वे यरूशलेम की पुत्री पर यह कह कर ताली बजाते और सिर हिलाते हैं, क्या यह वही नगरी है जिसे परमसुन्दरी और सारी पृथ्वी के हर्ष का कारण कहते थे?
12तेरे सब शत्रुओं ने तुझ पर मुंह पसारा है, वे ताली बजाते और दांत पीसते हैं, वे कहते हैं, हम उसे निगल गए हैं! जिस दिन की बाट हम जोहते थे, वह यही है, वह हम को मिल गया, हम उसको देख चुके हैं!
13यहोवा ने जो कुछ ठाना था वही किया भी है, जो वचन वह प्राचीनकाल से कहता आया है वही उसने पूरा भी किया है; उसने निठुरता से तुझे ढा दिया है, उसने शत्रुओं को तुझ पर आनन्दित किया, और तेरे द्रोहियों के सींग को ऊंचा किया हे।
14वे प्रभु की ओर तन मन से पुकारते हैं! हे सिय्योन की कुमारी (की शहरपनाह), अपने आंसू रात दिन नदी की नाईं बहाती रह! तनिक भी विश्राम न ले, न तेरी आंख की पुतली चैन ले!
15रात के हर पहर के आरम्भ में उठ कर चिल्लाया कर! प्रभु के सम्मुख अपने मन की बातों को धारा की नाईं उण्डेल! तेरे बाल-बच्चे जो हर एक सड़क के सिरे पर भूख के कारण मूर्च्छित हो रहे हैं, उनके प्राण के निमित्त अपने हाथ उसकी ओर फैला।

16हे यहोवा दृष्टि कर, और ध्यान से देख कि तू ने यह सब दु:ख किस को दिया है? क्या स्त्रियां अपना फल अर्थात अपनी गोद के बच्चों को खा डालें? हे प्रभु, क्या याजक और भविष्यद्वक्ता तेरे पवित्रस्थान में घात किए जएं?
17सड़कों में लड़के और बूढ़े दोनों भूमि पर पड़े हैं; मेरी कुमारियां और जवान लोग तलवार से गिर गए हैं; तू ने कोप करने के दिन उन्हें घात किया; तू ने निठुरता के साथ उनका वध किया है।
18तू ने मेरे भय के कारणों को नियत पर्व की भीड़ के समान चारों ओर से बुलाया है; और यहोवा के कोप के दिन न तो कोई भाग निकला और न कोई बच रहा है; जिन को मैं ने गोद में लिया और पाल-पोसकर बढ़ाया था, मेरे शत्रु ने उनका अन्त कर डाला है।
19उसके रोष की छड़ी से दु:ख भोगने वाला पुरुष मैं ही हूं;
20वह मुझे ले जा कर उजियाले में नहीं, अन्धियारे ही में चलाता है;

21उसका हाथ दिन भर मेरे ही विरुद्ध उठता रहता है।
22उसने मेरा मांस और चमड़ा गला दिया है, और मेरी हड्डियों को तोड़ दिया है;
23उसने मुझे रोकने के लिये किला बनाया, और मुझ को कठिन दु:ख और श्रम से घेरा है;
24उसने मुझे बहुत दिन के मरे हुए लोगों के समान अन्धेरे स्थानों में बसा दिया है।
25मेरे चारों ओर उसने बाड़ा बान्धा है कि मैं निकल नहीं सकता; उसने मुझे भारी सांकल से जकड़ा है;

26मैं चिल्ला चिल्लाके दोहाई देता हूँ, तौभी वह मेरी प्रार्थना नहीं सुनता;
27मेरे मार्गों को उसने गढ़े हुए पत्थरों से रोक रखा है, मेरी डगरों को उसने टेढ़ी कर दिया है।
28वह मेरे लिये घात में बैठे हुए रीछ और घात लगाए हुए सिंह के समान है;
29उसने मुझे मेरे मार्गों से भुला दिया, और मुझे फाड़ डाला; उसने मुझ को उजाड़ दिया है।
30उसने धनुष चढ़ा कर मुझे अपने तीर का निशाना बनाया है।

31उसने अपनी तीरों से मेरे हृदय को बेध दिया है;
32सब लोग मुझ पर हंसते हैं और दिन भर मुझ पर ढालकर गीत गाते हैं,
33उसने मुझे कठिन दु:ख से भर दिया, और नागदौना पिलाकर तृप्त किया है।
34उसने मेरे दांतों को कंकरी से तोड़ डाला, और मुझे राख से ढांप दिया है;
35और मुझ को मन से उतार कर कुशल से रहित किया है; मैं कल्याण भूल गया हूँ;

36इसलिऐ मैं ने कहा, मेरा बल नाश हुआ, और मेरी आश जो यहोवा पर थी, वह टूट गई है।
37मेरा दु:ख और मारा मारा फिरना, मेरा नागदौने और-और विष का पीना स्मरण कर!
38मैं उन्हीं पर सोचता रहता हूँ, इस से मेरा प्राण ढला जाता है।
39परन्तु मैं यह स्मरण करता हूँ, इसीलिये मुझे आाशा है:
40हम मिट नहीं गए; यह यहोवा की महाकरुणा का फल है, क्योंकि उसकी दया अमर है।

41प्रति भोर वह नई होती रहती है; तेरी सच्चाई महान है।
42मेरे मन ने कहा, यहोवा मेरा भाग है, इस कारण मैं उस में आशा रखूंगा।
43जो यहोवा की बाट जोहते और उसके पास जाते हैं, उनके लिये यहोवा भला है।
44यहोवा से उद्धार पाने की आशा रख कर चुपचाप रहना भला है।
45पुरुष के लिये जवानी में जूआ उठाना भला है।

46वह यह जान कर अकेला चुपचाप रहे, कि परमेश्वर ही ने उस पर यह बोझ डाला है;
47वह अपना मुंह धूल में रखे, क्या जाने इस में कुछ आशा हो;
48वह अपना गाल अपने मारने वाले की ओर फेरे, और नामधराई सहता रहे।
49क्योंकि प्रभु मन से सर्वदा उतारे नहीं रहता,
50चाहे वह दु:ख भी दे, तौभी अपनी करुणा की बहुतायत के कारण वह दया भी करता है;

51क्योंकि वह मनुष्यों को अपने मन से न तो दबाता है और न दु:ख देता है।
52पृथ्वी भर के बंधुओं को पांव के तले दलित करना,
53किसी पुरुष का हक़ परमप्रधान के साम्हने मारना,
54और किसी मनुष्य का मुक़द्दमा बिगाड़ना, इन तीन कामों को यहोवा देख नहीं सकता।
55यदि यहोवा ने आज्ञा न दी हो, तब कौन है कि वचन कहे और वह पूरा हो जाए?

56विपत्ति और कल्याण, क्या दोनों परमप्रधान की आज्ञा से नहीं होते?
57सो जीवित मनुष्य क्यों कुड़कुड़ाए? और पुरुष अपने पाप के दण्ड को क्यों बुरा माने?
58हम अपने चालचलन को ध्यान से परखें, और यहोवा की ओर फिरें!
59हम स्वर्गवासी परमेश्वर की ओर मन लगाएं और हाथ फैलाएं और कहें:
60हम ने तो अपराध और बलवा किया है, और तू ने क्षमा नहीं किया।

61तेरा कोप हम पर है, तू हमारे पीछे पड़ा है, तू ने बिना तरस खाए घात किया है।
62तू ने अपने को मेघ से घेर लिया है कि तुझ तक प्रार्थना न पहुंच सके।
63तू ने हम को जाति जाति के लोगों के बीच में कूड़ा-कर्कट सा ठहराया है।
64हमारे सब शत्रुओं ने हम पर अपना अपना मुंह फैलाया है;
65भय और गड़हा, उजाड़ और विनाश, हम पर आ पड़े हैं;

66मेरी आंखों से मेरी प्रजा की पुत्री के विनाश के कारण जल की धाराएं बह रही है।
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